Friday, March 7, 2014

भटके मन बन स्मृतियात्री

स्मृतियों का बन है घना
मन स्मृतियों में है खोया।
शब्दों के ताने-बाने में
अनुभव के मोती पिरो रहा।
दिन बीता, विस्तारी रात्री…
भटके मन बन स्मृतियात्री।

कुछ खट्टे से, कुछ खारे से,
कुछ कड़वे, मीठे, कुछ सारे से।
बीते दिन निशि में टिमके हैं
सुदूर गगन के तारे से।
दीपक की ज्यों जले बाती,
भटके मन बन स्मृतियात्री।

©आशुतोष ओ. साहू